भगवान नैगमेष – सनातन और जैन परंपरा के अनकहे 'बाल-रक्षक' देवता
ASTROLOGER SHWEETA OBEROI
ASTROLOGER SHWEETA OBEROI
द्वारा: श्वेता ओबेरॉय
भारतीय संस्कृति और धर्म की गहराई में अनेक ऐसे रहस्य छिपे हैं, जो समय के साथ मुख्यधारा से ओझल हो गए, लेकिन उनका ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। एक ऐसे ही दिव्य और पौराणिक देवता हैं—भगवान नैगमेष (जिन्हें नैगमेय, हरिणैगमेषी या अजमुख देवता के नाम से भी जाना जाता है)।
यदि आप सनातन धर्म की पौराणिक कथाओं, प्राचीन जैन इतिहास या आयुर्वेद के रहस्यों में रुचि रखते हैं, तो नैगमेष देव की कहानी आपको अचंभित कर देगी। इन्हें मुख्य रूप से संतान प्राप्ति, गर्भवती माताओं के स्वास्थ्य और नवजात शिशुओं की रक्षा करने वाले परम देवता के रूप में पूजा जाता रहा है।
आइए, आज के इस लेख में भगवान नैगमेष के अस्तित्व, विभिन्न धर्मों में उनके उल्लेख और पुरातात्विक प्रमाणों की गहराई से पड़ताल करते हैं।
भगवान नैगमेष: परिचय और दिव्य स्वरूप
सबसे पहले, भगवान नैगमेष के विशिष्ट स्वरूप को समझना आवश्यक है। प्राचीन मूर्तियों और ग्रंथों के अनुसार, इनका शरीर एक सुगठित पुरुष का है, लेकिन इनका मस्तक अज (बकरे) या कभी-कभी मृग (हिरण) का होता है।
पौराणिक दृष्टिकोण से, बकरे का सिर (अजमुख) प्रचुरता, प्रजनन क्षमता (Fertility) और अदम्य जीवन-ऊर्जा (Vitality) का प्रतीक माना जाता है। कुषाण काल की कई मूर्तियों में, इन्हें अपने दोनों कंधों और गोद में छोटे-छोटे बच्चों को स्नेहपूर्वक उठाए हुए दिखाया गया है, जो प्रत्यक्ष रूप से उनके 'वात्सल्य' और 'बाल-रक्षक' स्वरूप को उजागर करता है।
कहां-कहां है इनका जिक्र? (साहित्यिक प्रमाण)
भगवान नैगमेष का उल्लेख भारत की तीन सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान परंपराओं में मिलता है: सनातन (वैदिक) साहित्य, जैन धर्मग्रंथ और आयुर्वेद संहिताएं।
1. सनातन (वैदिक) और पौराणिक साहित्य में उल्लेख
महाभारत और विभिन्न पुराणों में नैगमेष देव को भगवान शिव और कार्तिकेय से जोड़ा गया है।
महाभारत (वन पर्व): महाभारत के अनुसार, जब भगवान कार्तिकेय (स्कंद) का जन्म हुआ, तब उनकी सुरक्षा और सहायतार्थ कई दिव्य गण और मातृकाएं (मातृ-शक्तियां) उत्पन्न हुईं। नैगमेष (या नैगमेय) उन्हीं प्रमुख गणों में से एक थे।
स्कंद पुराण: यहाँ इन्हें कार्तिकेय का एक अंश या अनुचर माना गया है, जो बच्चों को बुरी शक्तियों (ग्रहों) से बचाने का कार्य करते हैं।
सप्तमातृका रक्षक: पौराणिक परंपरा में, बच्चों की रक्षा करने वाली सात देवियों (सप्तमातृकाओं) के साथ नैगमेष देव को भी एक संरक्षक के रूप में स्थान दिया गया है।
2. जैन धर्म से जुड़ा गहरा नाता (कल्पसूत्र और महावीर स्वामी)
जैन धर्म की श्वेतांबर परंपरा में नैगमेष देव (जिन्हें यहाँ 'हरिणैगमेषी देव' कहा जाता है) का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इनका सबसे प्रमुख और अलौकिक उल्लेख जैनों के प्रसिद्ध ग्रंथ 'कल्पसूत्र' में मिलता है।
गर्भ परिवर्तन (गर्भ-अपहरण) की कथा:
कल्पसूत्र के अनुसार, जब 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर की आत्मा सर्वार्थसिद्ध देवलोक से च्यवकर (अवतरित होकर) पृथ्वी पर आई, तो उनका प्रारंभिक गर्भस्थापन एक ब्राह्मण परिवार (माता देवानंदा और ऋषभदत्त ब्राह्मण) के उदर में हुआ।
परंतु, जैन परंपरा और आगमों के अनुसार, तीर्थंकर का जन्म केवल क्षत्रिय राजकुल में ही होना नियत था। इस विधान को पूरा करने के लिए देवराज इंद्र (सौधर्म इंद्र) ने अपने दिव्य दूत और सेनापति हरिणैगमेषी देव को यह कार्य सौंपा।
हरिणैगमेषी देव की भूमिका: हरिणैगमेषी देव ने अपनी दिव्य शक्तियों से माता देवानंदा और क्षत्रिय रानी त्रिशला—दोनों को एक ही समय पर गहरी योगनिद्रा में सुला दिया।
बिना किसी कष्ट के, उन्होंने अत्यंत कोमलता से माता देवानंदा की कुक्षी से तीर्थंकर के पवित्र गर्भ को अपनी हाथों की अंजलि में लिया।
इसके बाद, उन्होंने उस पवित्र गर्भ को राजा सिद्धार्थ की पत्नी रानी त्रिशला के उदर में प्रतिस्थापित कर दिया। इसके साथ ही, उन्होंने माता देवानंदा द्वारा देखे गए 14 शुभ महास्वप्नों को भी रानी त्रिशला की चेतना में स्थानांतरित कर दिया।
यह घटना जैन इतिहास में 'गर्भ-अपहरण' या 'गर्भ-स्थानांतरण' के नाम से विख्यात है, और इस महान कार्य के सूत्रधार हरिणैगमेषी देव ही थे।
3. आयुर्वेद और चिकित्सा में नैगमेष (सुश्रुत संहिता)
प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति, आयुर्वेद, में भी नैगमेष का उल्लेख बच्चों की बीमारियों के संदर्भ में मिलता है।
बालग्रह विशेषज्ञ: सुश्रुत संहिता और चरक संहिता (कामारभृत्य - Pediatrics) में बच्चों को होने वाले संक्रामक रोगों और अज्ञात विकारों को 'बालग्रह' कहा गया है। इन 9 प्रमुख ग्रहों में एक 'नैगमेष ग्रह' भी है।
जब कोई बच्चा इस ग्रह के प्रभाव में आता है, तो उसे तेज बुखार, ऐंठन (Seizures) और सांस लेने में तकलीफ होती है।
उपचार और पूजा: प्राचीन वैद्य बच्चों के कमरों का धूपन (कीटाणुशोधन - नीम, लोबान, सरपंख की धूनी) करते थे और नैगमेष देव से बाल-रक्षा की प्रार्थना करते थे। यहाँ नैगमेष देव को प्रसन्न करके बीमारी को ठीक करने की परंपरा थी।
पुरातात्विक प्रमाण और मूर्तियां (Archaelogical Evidence)
भगवान नैगमेष की प्राचीनता और उनकी व्यापक पूजा के सबसे ठोस प्रमाण हमें पुरातात्विक अवशेषों से मिलते हैं।
मथुरा संग्रहालय (Mathura Museum): उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर और आसपास के क्षेत्रों से कुषाण काल (पहली से तीसरी शताब्दी ईस्वी) की नैगमेष देव की कई मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। ये मूर्तियां मथुरा संग्रहालय में आज भी संरक्षित हैं। इन मूर्तियों में नैगमेष देव को बकरे के मुख (अजमुख) के साथ, अपने कंधों और गोद में बच्चों को उठाए हुए स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जो उनके वात्सल्य और रक्षक स्वरूप का सबसे बड़ा प्रमाण है।
जैन तीर्थ और पांडुलिपियां: जैन कल्पसूत्र की चित्रित पांडुलिपियों (Miniature Paintings) में आज भी हरिणैगमेषी देव को नवजात शिशु (गर्भ) को हाथों में उठाए, हवा में उड़ते हुए चित्रित किया जाता है। यह चित्रण जैन कला और मान्यताओं में उनके महत्व को दर्शाता है।
वर्तमान में मंदिर और पूजा की स्थिति
आज के समय में नैगमेष देव की स्वतंत्र रूप से पूजा करने की परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है।
कोई सक्रिय स्वतंत्र मंदिर नहीं: वर्तमान में भारत में ऐसा कोई प्रसिद्ध या सक्रिय मंदिर नहीं है जहाँ केवल नैगमेष देव ही मुख्य देवता के रूप में स्थापित हों और उनकी प्रतिदिन पूजा होती हो।
अन्य देवताओं में समाहित: मध्यकाल के बाद सनातन धर्म में बाल-रक्षा और संतान-प्राप्ति के लिए भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय, षष्ठी देवी (छठी मैया) और शीतला माता की पूजा मुख्यधारा में आ गई। फलस्वरूप, नैगमेष देव का अस्तित्व इन्हीं देवताओं की कथाओं और प्राचीन ग्रंथों तक सीमित रह गया।
जैन परंपरा में स्मरण: जैन धर्म में भी उनकी कोई मूर्ति स्थापित करके पूजा नहीं की जाती, लेकिन पर्युषण पर्व के दौरान जब कल्पसूत्र का वाचन होता है, तब भगवान महावीर के जन्म और गर्भ-परिवर्तन के प्रसंग पर हरिणैगमेषी देव का विशेष स्मरण, गुणगान और चित्र-पूजन किया जाता है।
निष्कर्ष
भगवान नैगमेष भारतीय संस्कृति के उस अनकहे और समृद्ध पहलू का प्रतिनिधित्व करते हैं जहाँ मातृत्व, बाल-स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता को ईश्वर के एक विशेष स्वरूप से जोड़ा गया था। यद्यपि आज हम उनकी सीधी पूजा नहीं करते, लेकिन उनका अस्तित्व हमारे प्राचीन ग्रंथों और पुरातात्विक धरोहरों में अमर है।
वे हमें याद दिलाते हैं कि प्राचीन भारत में बाल-स्वास्थ्य और मातृत्व की सुरक्षा को कितना आध्यात्मिक महत्व दिया जाता था।
लेखिका श्वेता ओबेरॉय ASTROLOGER SHWEETA OBEROI एक स्वतंत्र शोधकर्ता और सांस्कृतिक लेखिका हैं, जो भारतीय परंपराओं, इतिहास और अध्यात्म के अनछुए पहलुओं को उजागर करने में रुचि रखती हैं।
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